| Specifications |
| Publisher: Pratibha Prakashan | |
| Author Sushma Devi Gupta | |
| Language: Hindi | |
| Pages: 256 | |
| Cover: HARDCOVER | |
| 9.00x6.00 inch | |
| Weight 450 gm | |
| Edition: 2006 | |
| ISBN: 8177021346 | |
| HBZ208 |
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'कल्' धातु से व्युत्पन्न कला शब्द का अर्थ है- ग्रहण करना, प्रेरणा देना। कुछ विचारक इसकी व्युत्पत्ति 'कण्ड् धातु से करते हैं, जिसे आनन्दित करने के अर्थ में लिया जाता है। सर्वप्रथम भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में नाटक के संदर्भ में कला शब्द का प्रयोग किया है। 'कला' की यूरोपीय दृष्टि भी वही है। 'आर्ट' शब्द के मूल में 'अर' धातु है जिसका अर्थ है बनाना, उत्पन्न करना।
कला मानव जीवन के इतिहास के साथ ही उद्भूत हुई एवं उसके उत्तरोत्तर विकास के साथ-साथ ही वह नित नये आयाम भी लेती गई। वस्तुतः मानव की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति का नाम ही 'कला' है। वह परमात्मा की अनुकृति की विशिष्टतम संज्ञा के नाम से अभिहित की जाती है जिसके पीछे सत्यं शिवं और सुन्दरं के समन्वयात्मक भाव का निदर्शन है।
भारतीय कला को जानने के लिए सूक्ष्म दृष्टि अपेक्षित है क्योंकि भारत में कला का विषय आत्मपरक रहा है। इसी कारण आध्यात्मिक कला-साधना द्वारा भारतीय कलाकार एवं उनकी लोक कल्याण कला अमर कहलायी। कला किसी देश के सांस्कृतिक गौरव, विकास एवं उत्थान की परिचायक होती है।
संस्कृत साहित्य में कला की अनेक विविधताएं दृष्टिगत होती हैं। वात्स्यायन के 'कामसूत्र' में चौंसठ प्रकार की कलाओं का वर्णन मिलता है। इन चौंसठ कलाओं में ललित और उपयोगी दोनों प्रकार की कलाएं आती हैं। कहीं-कहीं मूर्त और अमूर्त रूपों में भी इनका विभाजन प्राप्त होता है। मूर्त कलाओं में आने वाली मूर्तिकला, वास्तुकला तथा चित्रकला का आधार रूपगत होता है। अमूर्त कलाओं में स्थान प्राप्त नृत्य, संगीत एवं काव्य कला का आधार मानसिक होता है तथा इन सबकी उपयोगिता स्वतः सिद्ध है।
'नृत्' धातु से निष्पन्न नृत्य सदैव से ही व्यक्तिगत एवं सामाजिक मनोरंजन तथा आनन्दानुभूति का साधन रहा है तथा मानव-मन की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अति सहज, सरल एवं सशक्त उपाय भी, इसीलिए प्रायः प्रत्येक सभ्यता-संस्कृतियों में इसका सम्माननीय स्थान रहा है।
'भारतीय ललित कलाएं एवं नृत्य कला" विषयक प्रस्तुत ग्रन्थ को तीन खण्डों में विभाजित कर जहां प्रथम खण्ड में चित्र, संगीत एवं मूर्तिकला के साथ नृत्य कला के अभिन्न सम्बन्ध को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है वहीं द्वितीय खण्ड में वैदिक एवं लौकिक संस्कृत साहित्य के साथ नृत्यकला के घनिष्ठ सम्बन्ध को उद्घाटित करने का यथासम्भव प्रयत्न किया गया है। तृतीय एवं अन्तिम खण्ड में जम्मू, कश्मीर एवं लद्दाख की संस्कृति को दर्शाते वहां के 'लोक नृत्यों' की विद्वान पाठकों को विस्तृत जानकारी देने का अकिञ्चन प्रयास किया गया है। प्रस्तुत ग्रन्थ में संकलित सामग्री से पाठक यत्किञ्चित लाभान्वित अवश्य होंगे इसी आशा के साथ इस ग्रन्थ को पाठकों के हाथों में सौंपती हूँ।
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